अंक 50 अक्टूबर-दिसम्बर 2011 |
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कहानियां |
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वासुदेव : शांबरी |
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जयनंदन : सेराज बैंड बाजा |
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प्रत्यक्षा : आइने में |
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रूपलाल बेदिया : नया नगर की सुन्दरी |
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राकेश कुमार सिंह : पोन |
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कमल : जहेरथान |
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अश्विनी कुमार पंकज : अपनी कब्र खोदने वाले |
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शैली खत्री : भूख और बंदूक के बीच |
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ज्योति लकड़ा : कोराईन डूबा |
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ईस्टराइन इरालू
: अपोतिया मौत (अनुवाद- अक़ील कैस) |
लेख |
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मधुरेश : गोपीनाथ महान्ती और आदिवासी समाज विशेष संदर्भ : 'परजा' |
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रोहिणी अग्रवाल
: समकालीन हिन्दी उपन्यास और दिकू समाज का आदिवासी चिंतन |
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अर्चना वर्मा
: सभ्यता के अंधेरों का प्रतिकार : आदिम का रहस्य सन्दर्भ- किस्सागो(एल आब्लादोर) |
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डॉ. सुश्री शरद सिंह
: भारत की आदिवासी लोककथाओंमें स्त्रीविमर्श |
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हरि राम मीणा
: निजी सम्पत्ति एवं आदिवासी परम्परा |
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विद्याभूषण
: आदिवासी अस्मिता और हिन्दी उपन्यास |
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वासवी किड़ो
: सम्पत्ति और डाइन एक सिक्के के दो पहलू |
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रामनाथ शिवेन्द्र
: आदिवासी से अनुसूचित जनजाति के राजमार्ग पर चलते हुए |
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संजय कृष्ण
: विकास, विस्थापन और आदिवासी |
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सुनील मिंज
: आदिवासी समाज और शिक्षा |
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डॉ. सुधीर सक्सेना
: आटविक जनजातियों में संघर्षं चेतना |
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केदार प्रसाद मीणा
: मीणा आदिवासी : समाज और संस्कृति |
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कुमार अनुपम
: थारू जनजाति एवं थारू बोली |
कविताएं |
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निर्मला पुतुल : स्वर्गवासी पिता के नाम पाती, तुम्हारे एहसान लेने से पहले सोचना पड़ेगा हमें |
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बीरेन्द्र कुमार महतो
: देखा क्या...?, देख कर ये क्रूर लीला, स्मृतियों कब्र से |
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अलोका
: एचबी रोड से कल्बरोड तक, सरहुल |
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तरुण कुमार लाहा
: प्यास, फैसला |
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जवाहर लाल बांकिरा
: सलवा जुडूम, बिरसा और बेड़ियां |
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दिनेश कुशवाहा
: एकलव्य की तरफ से, सांप |
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अशोकसिंह: पहाड़ पर बैठे एक आदिवासी प्रेमी-युगल
की बातचीत, नक्सली जंगल में रह रहे एक आदिवासी दम्पति की व्यथा कथा
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सुशीलापुरी: थारु औरतें
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शशिभूषण मिश्र: 'हमें असभ्य रहने दो' |
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यश मालवीय: चुप, जल-जीवन जंगल-ज़मीन |
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अनूप अशेष : 'वह आदिवासी-सी सहज लड़की' |
| व्यंग्य |
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पंकज मित्र
: अथ आदिवासी विमर्श कथा |
चित्रवीथी |
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मैत्रेयी पुष्पा
: दावेदार बनाम ताबेदार |
यात्रावृत्ता |
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| कला |
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उदयन वाजपेयी : संगीत से चित्रकला तक (परधानों की विचित्र किंतु सामान्य कथाएं) |
| नृत्य संगीत |
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साक्षात्कार |
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सभी सत्ताधारी आदिवासियों के आदिवासीपन से डरते हैं :
प्रो. वीरभारत तलवार के साथ केदार प्रसाद मीणा की बातचीत |
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बदलाव के लिए प्रतिबध्द है आदिवासी साहित्य : वरिष्ठ रचनाकार रमणिका गुप्ता से रजनी गुप्त की लंबी बातचीत |
| संपादकीय |
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आदिवासी समाज और साहित्य |
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रंगमंच |
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परिचर्चा |
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इस सप्ताह |
| समकालीन कहानियों में |
भूख और बंदूक के बीच:शैली खत्री |
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आज सुंदरी की इच्छा नहीं हो रही थी बिस्तर से बाहर निकले; पर आराम क्या इतनी आसानी से मिलने वाली चीज है कि चाह लिया और मिल गया। वह लेटी रही पर मन में सैकड़ों चिंताओं
ंका डेरा था, आज खाना क्या बनेगा, पैसे कहां से आएंगे, बाप का जर कम हुआ या नहीं, काम की खोज में आज कहीं जाना ठीक रहेगा कि आज जंगल पर ही निर्भर हो जाएं। जब चिंताएं बढ़ती गईं तो वह उठ कर बैठ गई। बाप अपने बिस्तर पर नहीं था, उसने एक भरपूर अंगड़ाई लेकर बदन का दर्द निकाला। इ फागुन चइत महीना में हमीन कर गोटे शरीर बाथेला, उसने सोचा और दुबारा अंगड़ाई ली। घर से बाहर आकर देखा तो बैइर उग चला था,

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शांबरी:वासुदेव |
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जाड़े की सुबह गरीब के बच्चे की तरह ठंड से कांप रही थी। हालांकि सुबह का छौना सूरज क्षितिज को लांघकर ऊपर तक चढ़ आया था, फिर भी हवा में कंपकंपी कम नहीं हुई थी। हां, कुनकुनी धूप देह को सुकून जरूर पहुंचाने लगी थी। वहां एक बूढ़ा तलमलाता हुआ आया और वहीं पुआल के ढेर पर धम्म से बैठ गया। वह नशे में था और 'अल-वल' बोल रहा था, 'इसार के औरे कोय दिकू आलक रेंजर बनके।... हमरे केर कुटुम्ब में तो एसन बुझाएला कि रेंजर के खकराए खाए गेलक! अब व दिकू-मन गाछ काटबै और जेहेल जाबै हमर आदमी-मन।'अब तक वहां एक दूसरा वृध्द भी आ गया था देह सेकने। वह खैनी मल रहा था। उसने टोक
दिया,'विहाने-विहाने के नाके गरियायक लइगहा नेता' उसने खैनी झाड़ते हुए आगे कहा, 'जेबेरा अपन राइज
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नया नगर की सुन्दरी:रूपलाल बेदिया |
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वह टूटी-फूटी दड़बेनुमा झोपड़ी में रहती थी। जब मैंने पहली बार उसे देखा था या यों कहें कि सहसा किसी दुर्घटना की तरह दिख गयी थी तो अन्तर्मन में कई प्रकार के सवाल उठे थे। आदिवासी बहुल उस सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था। इसी की निगरानी के लिए मुझे एक सहायक के साथ भेजा गया था। जिस ग्रामीण क्षेत्र में सड़क निर्माण हो रहा था वहां हम
जैसे शहरियों के लिए दूर-दूर तक कोई ठौर नजर नहीं आ रहा था। ग्रामीणों में शहरियों के प्रति एक स्वाभाविक सन्देह और अविश्वास की भावना रहती है। हमारी इच्छा थी कि गांव में ही किसी के घर का एक कोना मिल जाता तो हम दोनों वहीं रह लेते। इससे हमें काम-काज में भी सुविधा होती और मजदूरों से एक तरह का रिश्ता कायम करने में मदद मिलती। पांच-छह दिनों तक तो हम शहर से ही आ-जाकर काम चलाते रहे। लेकिन रोज-रोज यह सम्भव न था। अपनी बाईक से नित्य दोनों ओर से मिलाकर एक सौ दस किलोमीटर की दूरी तय करना कमाई अठन्नी और खर्चा रुपया जैसी बात थी। अत: हमने झिरगा मांझी से बात की। वह उसी इलाके का एक ग्रामीण था और सड़क निर्माण कार्य में हमने उसे ग्रामीणों एवं हमारे बीच संयोजक की भूमिका निभाने के लिए सहयोगी के तौर पर रख लिया था। अनजान जगह में गांव के ही किसी व्यक्ति का सहयोग मिल जाने से काम करवाना आसान हो जाता है।

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