अंक : 56 अप्रैल - जून 2013
कहानियां
mmmm हृदयेश : सम्मानजनक जीना
m चन्द्रकिशोर जायसवाल : सहेलियां
m जीवनसिंह ठाकुर : बस इतनी सी
m गोविन्द सेन : लड़की - एक जातिवाचक संज्ञा
m रवीन्द्र कात्यायन : लालचन्द उर्फ़ आम आदमी की स्लो डे
m प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव : तपती धरती पर उगता सुख
m रामनाथ शिवेन्द्र : चलिए लिए लौट चलें
m वन्दना शुक्ल : कॉमरेड पण्डित दीनानाथ शास्त्री
m मनोज कुमार : शेष प्रश्न
m चन्द्ररेखा ढडवाल : जिन्दा रहने के लिए ?

लेख

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विनोद शाही : महाख्यान, उपन्यास, प्रेमाख्यान और मिथक

m डा. गौरी त्रिपाठी : उदास नस्लें : भारतीय मुसलमान औरबंटवारे की त्रासदी

कविताएं

m रामकुमार आत्रेय : सूरजमुखी के खेत में लड़की, नींद में एक घरेलू स्त्री
m वाज़दा ख़ान : गीत
m विभूति कुमार : ग़ज़लें
m विनीता जोशी : भाग जाऊं कहीं
m निर्माला तोदीं : अंकुश, जकड़न, चाहत, पाना, एक बात है

कथा दस्तक

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लघुकथाएं

m संतोष सुपेरकर : 'धंधा'
m कमल चोपड़ा : इतनी दूर
m सुभाष नीरव : बर्फी
m राधेलाल 'नवचक्र' : सुझाव
m खेमकरण 'सोमन' : वह लड़की है, कौन है उध
मतान्तर
m कंवल भारती : डा. रामविलास शर्मा और उनका परम्परा मूल्यांकन
मुद्दा
m डा. राजकुमार : विविध प्रसंग : हिन्दी की शक्ति
कथा नेपथ्य
m मधुरेश : मुंशी नवजादिक लाल और उनका
m 'शांति-निकेतन': पश्चिमी सभ्यता का एक धारावाहिक क्रिटीक
रागलन्तरानी
m सुशील सिध्दार्थ : पर कतरने हैं

प्रसंग-वश

m अश्विनी कुमार पंकज : महानता के बरगद तले भारतीय रंगमंच

रंगमंच

m डा. श्वेता पाठक : हिन्दी रंगमंच की दशा और दिशा
संपादकीय
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समीक्षाएं
पत्र
इस सप्ताह
समकालीन कहानियों में

बस इतनी सी: जीवन सिंह ठाकुर

यह विस्फोटक खबर अनवर शेख ने ही बताई थी। वह भी मुझे। सीधे-सीधे रविमोहन को नहीं बताई थी। अनवर से जब यह बात सुनी तो पहली बार तो मैं नाराज हुआ कि यार तू भी अजीब है। ये बात थी तो तुझे रवि मोहन को या मुझे कहना था। नहीं तो किशोर को कहता। आखिर क्यों नहीं कहा? अनवर शेख मेरी प्रतिक्रिया देख कर पहले तो अचकचा गया... फिर थोड़ी देर चुप रहा... यार कहता कैसे? कैसे का क्या मतलब? क्या हम अज्ञातवास में थे? या कहीं विदेश में थे? अनवर ने तड़प कर कहा ये बात नहीं है यार मेरे... बात यूं थी कि जब मुझे यह बात पता चली तब तक हम सभी नौकरियों में इधर-उद्दर जा चुके थे। शादी शुदा हो चुके थे। कहने को कुछ नहीं था। हां एक गहरा अफसोस था ...VIEW

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सहेलियां: चन्द्रकिशोर जायसवाल

मां वत्सला और बेटी गुंजन को पड़ोस की दीप्तिमेधा के चार साल के बेटे शुभम् का जब-तब आ जाना अच्छा ही लगता था। वे दोनों उम्र की दूरी लांघकर उस छोटे बच्चे के साथ देर तक बतियाते थे और उसे कुछ खिला-पिलाकर ही विदा किया करते थे। एक सुबह शुभम् के साथ एक डेढ़-दो साल की छोटी बच्ची भी आ गयी थी। गुंजन पूछ बैठी, 'यह कौन है, शुभम्?' शुभम् ने जवाब
दिया था, 'यह पप्पी है, मेरी गर्ल-फ्रेंड।' मां-बेटी दोनों हंस पड़ी थीं। उन बच्चों के जाते ही मां बुदबुदायी, 'हंसी आती है यह सुनकर कि इस छोटे बच्चे की भी कोई गर्ल-फ्रेंड
है!' 'तुम्हें खबर हो कि न हो,' बेटी ने सुनाया, 'हमारे इस मोहल्ले में ब्वाय-फ्रेंड और गर्ल-फ्रेंड की भरमार है। ऐसा जमाना आया है, मां' बेटी हंस पड़ी, 'कि जो लड़का नवीं-दसवीं का छात्र है, वह भी दोस्तों की नजर में ऊपर चढ़ जाने के लिए ...VIEW

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सम्मानजनक जीना: हृदयेश

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रात के नौ से ऊपर थे। बारिश हो रही थी। बारिश को शुरू हुए खासा वक्त हो गया था। उसके जो ताव-तेवर थे, लगता था कि वह अभी रुकेगी नहीं। हो सकता है कि पानी रात भर गिरे। जुलाई का महीना था ऐसा हो सकना गैर मुमकिन भी नहीं था। बाहर सड़क पर लगभग
सन्नाटा था। आसपास भी। वह जनसंकुल इलाका नहीं था। नारायण स्वामी ने अपने कक्ष से एक बार अंदर खिड़की के पास जाकर और एक बार बाहर बरामदे में
निकलकर इस बारिश को देखा था। चंद मिनट तक। यह देखना न देखना जैसा था। पानी के धार बांधकर गिरने में आवाज थी। इस आवाज को सुनना न सुनना जैसा था। नारायण स्वामी के मस्तिष्क में रह-रहकर टे्रन छक-छू-तुक---- छक-छू-तुक की आवाज के साथ दौड़ने लगती थी और उसी के साथ सोच में कुछ छंटने, कुछ जुड़ने लगता था। ...VIEW

 

 

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