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इस सप्ताह |
| समकालीन कहानियों में |
बस इतनी सी: जीवन सिंह ठाकुर |
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यह विस्फोटक खबर अनवर शेख ने ही बताई थी। वह भी मुझे। सीधे-सीधे रविमोहन को नहीं
बताई थी। अनवर से जब यह बात सुनी तो पहली बार तो मैं नाराज हुआ कि यार तू भी
अजीब है। ये बात थी तो तुझे रवि मोहन को या मुझे कहना था। नहीं तो किशोर को कहता।
आखिर क्यों नहीं कहा? अनवर शेख मेरी प्रतिक्रिया देख कर पहले तो अचकचा गया... फिर थोड़ी देर चुप
रहा... यार कहता कैसे?
कैसे का क्या मतलब? क्या हम अज्ञातवास में थे? या कहीं विदेश में थे? अनवर ने तड़प कर कहा ये
बात नहीं है यार मेरे... बात यूं थी कि जब मुझे यह बात पता चली तब तक हम सभी नौकरियों में इधर-उद्दर
जा चुके थे। शादी शुदा हो चुके थे। कहने को कुछ नहीं था। हां एक गहरा अफसोस
था ...
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सहेलियां: चन्द्रकिशोर जायसवाल |
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मां वत्सला और बेटी गुंजन को पड़ोस की दीप्तिमेधा के चार साल के बेटे शुभम् का जब-तब आ
जाना अच्छा ही लगता था। वे दोनों उम्र की दूरी लांघकर उस छोटे बच्चे के साथ देर तक
बतियाते थे और उसे कुछ खिला-पिलाकर ही विदा किया करते थे। एक सुबह शुभम् के साथ
एक डेढ़-दो साल की छोटी बच्ची भी आ गयी थी। गुंजन पूछ बैठी, 'यह कौन है, शुभम्?' शुभम् ने जवाब
दिया था, 'यह पप्पी है, मेरी गर्ल-फ्रेंड।'
मां-बेटी दोनों हंस पड़ी थीं।
उन बच्चों के जाते ही मां बुदबुदायी, 'हंसी आती है यह सुनकर कि इस छोटे बच्चे की भी कोई गर्ल-फ्रेंड
है!'
'तुम्हें खबर हो कि न हो,' बेटी ने सुनाया, 'हमारे इस मोहल्ले में ब्वाय-फ्रेंड और गर्ल-फ्रेंड की भरमार
है। ऐसा जमाना आया है, मां' बेटी हंस पड़ी, 'कि जो लड़का नवीं-दसवीं का छात्र है, वह भी दोस्तों की नजर
में ऊपर चढ़ जाने के लिए
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सम्मानजनक जीना: हृदयेश |
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रात के नौ से ऊपर थे। बारिश हो रही थी। बारिश को शुरू हुए खासा वक्त हो गया था। उसके
जो ताव-तेवर थे, लगता था कि वह अभी रुकेगी नहीं। हो सकता है कि पानी रात भर गिरे।
जुलाई का महीना था ऐसा हो सकना गैर मुमकिन भी नहीं था। बाहर सड़क पर लगभग
सन्नाटा था। आसपास भी। वह जनसंकुल इलाका नहीं था।
नारायण स्वामी ने अपने कक्ष से एक बार अंदर खिड़की के पास जाकर और एक बार बाहर बरामदे में
निकलकर इस बारिश को देखा था। चंद मिनट तक। यह देखना न देखना जैसा था। पानी के धार बांधकर
गिरने में आवाज थी। इस आवाज को सुनना न सुनना जैसा था। नारायण स्वामी के मस्तिष्क में रह-रहकर
टे्रन छक-छू-तुक---- छक-छू-तुक की आवाज के साथ दौड़ने लगती थी और उसी के साथ सोच में कुछ
छंटने, कुछ जुड़ने लगता था।
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