ड़ी में बहुत भीड़ नहीं थी, इसलिए मंदार आराम से चढ़ गया। खिड़की के पास उसे मन
मुताबिक जगह भी मिल गई। दफ्तर के काम से अक्सर उसे यात्राएँ करनी पड़ती थीं। यह कूपा गद्देवाला आरामदेह कुर्सीयान था। जिस सीट पर वह बैठा था उस पर तीन यात्रियों
के बैठने की जगह थी, जहाँ अभी वह अकेला था। उसके सामने भी उसी प्रकार की सीटें थीं, और वह खाली थीं। इसलिए उस पर उसने अपने पैर फैला दिए और बैग से एक किताब निकालकर पन्ना उलटने लगा।...
