अंक 52 अप्रैल-जून 2012
कहानियां
mmmm पी.एन. जायसवाल : इश्क टें टें
m अपूर्व जोशी : मुकम्मल जहां नहीं रहा ये
m डॉ मोहसिन खान : है! दर कहां है?
m हुस्न तबस्सुम 'निंहां' : ख़ाविन्द-दां
m जितेन ठाकुर : गंगा-वास
m रमेश खत्री : लोकेश तुम कहां हो?

कथा- दस्तक

m वन्दना शुक्ला : फैसला
लघुकथाएं
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खेमकरण 'सोमन' : कूड़ा-करकट

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ज्ञानदेव मुकेश : अपना-अपना 'एक

  डा. गोपाल कृष्ण शर्मा : श्रमदान

लेख

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राजेश राव : स्त्री लेखन का रचनात्मक सरोकार और समकालीन उपन्यास

m क्षमा शर्मा : सिल्क स्मिता, भंवरी देवी और औरतों की च्वाइस

कथा नेपथ्य

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मधुरेश : पर्व : गहरे मानवीय आशयों वाला महाख्यान

यात्रा-वृत्ता

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गोविन्द मिश्र : महाविशेषणों की भूमि : कनाडा

संस्मरण

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हृदयेश : अलीगढ़ के वे दिन

मुद्दा

m डा. राजकुमार : लोक-साहित्य, लोक-कलाओं के संरक्षण और अध्ययन की समस्याएं

कविताएं

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रामजी तिवारी : नयी तरकीब, परीक्षा, बिजूका

m भोलानाथ कुशवाहा : तुम प्रतीक नहीं हो
m राधेलाल बिजधावने : पिंजरा, घड़ियां
राग लन्तरानी
m सुशील सिध्दार्थ : बातन हाथी पाइये

सिनेमा

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धनन्जय कुमार चौबे : मीडिया और हिन्दी सिनेमा

उत्तर कथा
m अशोक मिश्र : खिली रही शब्दों की दुनियां
प्रसंग वश
m सुभाष चन्द्र कुशवाहा : भाषा की कुलीनता बनाम दासता की संस्कृति
समीक्षाएं
सम्पादकीय
पत्र
 
इस सप्ताह
समकालीन कहानियों में

मुकम्मल जहां नहीं रहा ये: अपूर्व जोशी

अनवर लापता है। पिछले दो दिनों से उसने कंपनी आना बंद कर दिया। अब्बू मास्टर हैरान, परेषान। गेट का गार्ड मालिक से षिकायत कर रहा था कि जबसे कारीगरों को दिहाड़ी पर रखा है सभी शुक्रवार की नमाज पढ़ने जाने लगे हैं। जब तक पीस रेट पर काम करते थे नमाज से कुछ लेना-देना नहीं था। गार्ड यह भी कह रहा था कि प्रोडक्षन मैनेजर राकेष के रहते यह कारीगर ... VIEW

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है! दर कहां है? : डॉ. मोहसिन ख़ान

^cकरीद का चांद आसमान में तैर आया था, मोहल्ले के कितने मर्द सिर टोपियों से ढंके और औरतें सिर पर पल्लू डाले एक ऐसी जगह पर खड़े थे और आसमान में निगाहें गड़ा रहे थे कि उन्हें चांद दिखाई दे जाए। थोड़ी तलाश पर धीरे-धीरे सभी की आंखों में चांद की पतली लकीर सी उभर आती। होंट हरकतें करने लगते, अरबी की आयतों के साथ और एक बुड़बुड़ाहट माहौल में ...VIEW

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इश्क टें टें : पी.एन. जायसवाल

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ड़ी में बहुत भीड़ नहीं थी, इसलिए मंदार आराम से चढ़ गया। खिड़की के पास उसे मन मुताबिक जगह भी मिल गई। दफ्तर के काम से अक्सर उसे यात्राएँ करनी पड़ती थीं। यह कूपा गद्देवाला आरामदेह कुर्सीयान था। जिस सीट पर वह बैठा था उस पर तीन यात्रियों के बैठने की जगह थी, जहाँ अभी वह अकेला था। उसके सामने भी उसी प्रकार की सीटें थीं, और वह खाली थीं। इसलिए उस पर उसने अपने पैर फैला दिए और बैग से एक किताब निकालकर पन्ना उलटने लगा।...

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